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Consumer Rightsसरकारी परिपत्रों से सत्यापितअंतिम अपडेट: 16 अगस्त 2026समीक्षक: ComplaintAdda Editorial Team

बिल्डर के NCLT दिवालिया होने पर: क्या आप प्रमोटरों और निदेशकों पर उपभोक्ता अदालत में मुकदमा चला सकते हैं?

हजारों मध्यमवर्गीय भारतीय घर खरीदारों के लिए, एक फ्लैट खरीदना उनके जीवन का सबसे बड़ा वित्तीय निवेश होता है। जब कोई प्रोजेक्ट अनिश्चित काल के लिए टल जाता है, तो कई लोग राहत के लिए उपभोक्ता आयोगों का रुख करते हैं। हालांकि, जब बिल्डर कंपनी NCLT दिवालियापन में प्रवेश करती है, तो घर खरीदारों को अक्सर बताया जाता है कि वैधानिक स्थगन (moratorium) के तहत सभी कानूनी कार्यवाही रोक दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी ढाल की सीमाओं को स्पष्ट किया है, जिससे प्रमोटरों और निदेशकों से जवाबदेही चाहने वाले घर खरीदारों को राहत मिली है।

घर खरीदार का कानूनी संघर्ष और 'मोरटोरियम' की ढाल

भारत में एक आम घर खरीदार की स्थिति पर विचार करें। आप अपने जीवन की बचत का बड़ा हिस्सा निवेश करते हैं, बैंक से होम लोन लेते हैं, और तीन साल में मिलने वाले फ्लैट के लिए हर महीने ईएमआई (EMI) चुकाते हैं। लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी प्रोजेक्ट केवल कंक्रीट का ढांचा बनकर रह जाता है। हताश होकर, आप रिफंड या पजेशन की मांग करते हुए उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करते हैं।

अचानक, एक क्रेडिटर (लेनदार) बकाया कर्ज के विवाद में बिल्डर कंपनी को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में खींच ले जाता है। कंपनी के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू हो जाती है। इस खबर के साथ ही एक कानूनी प्रतिबंधात्मक शब्द सामने आता है: स्थगन (Moratorium)

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 की धारा 14 के तहत, एक बार मोरटोरियम (स्थगन) लागू होने के बाद, कॉरपोरेट देनदार (builder company) के खिलाफ कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता और न ही लंबित मामलों को जारी रखा जा सकता है। पूर्व में, डेवलपर्स और समाधान पेशेवर (Resolution Professionals) इस धारा का उपयोग एक ढाल के रूप में करते थे। उनका तर्क था कि चूंकि कंपनी NCLT में है, इसलिए कंपनी के प्रमोटरों, निदेशकों या जमीन मालिकों के खिलाफ उपभोक्ता मामलों को भी रोक दिया जाना चाहिए।

वर्षों तक, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने अक्सर इस तर्क को स्वीकार किया और उपभोक्ता शिकायतों को अनिश्चित काल (*sine die*) के लिए स्थगित कर दिया, जिससे घर खरीदार अधर में लटक गए।


मामला: तेजस जे. शाह बनाम मंत्री टेक्नोलॉजी

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को *तेजस जे. शाह और अमीषा टी. शाह और अन्य बनाम मंत्री टेक्नोलॉजी कांस्टेलेशन प्राइवेट लिमिटेड (अब बियॉन्ट टेक्नोलॉजी कांस्टेलेशन प्राइवेट लिमिटेड के रूप में ज्ञात) और अन्य* (सिविल अपील संख्या 4289-4290/2025) के मामले में सीधे संबोधित किया, जिसका निर्णय 27 जुलाई 2026 को आया।

बेंगलुरु में 'मंत्री मान्यता एनर्जिया' आवासीय परियोजना में फ्लैट बुक करने वाले खरीदार पजेशन में देरी के कारण NCDRC पहुंचे थे। जब डेवलपर कंपनी दिवालिया हो गई, तो NCDRC ने 20 जनवरी 2025 को घर खरीदारों के उस आवेदन को खारिज कर दिया जिसमें कंपनी के प्रमोटरों, निदेशकों और जमीन मालिकों के खिलाफ मामला जारी रखने की मांग की गई थी, और पूरे मामले को स्थगित कर दिया था।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने NCDRC के इस आदेश को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि IBC की धारा 14 के तहत वैधानिक स्थगन केवल कॉरपोरेट देनदार (डेवलपर कंपनी) तक ही सीमित है। कोर्ट ने कहा:

मोरटोरियम का उद्देश्य समाधान प्रक्रिया के तहत कंपनी की संपत्तियों की सुरक्षा करना है ताकि रिकवरी प्लान तैयार किया जा सके। यह व्यक्तिगत रूप से प्रमोटरों, निदेशकों या जमीन मालिकों को उनके व्यक्तिगत दायित्वों से कोई सुरक्षात्मक ढाल प्रदान नहीं करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार शेष गैर-कॉरपोरेट प्रतिवादियों के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत की सुनवाई जारी रखे।


कानूनी मिसाल को समझना

यह कोई नया कानूनी सिद्धांत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस सटीक सिद्धांत को 2021 में *अंजलि राठी और अन्य बनाम टुडे होम्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड* के ऐतिहासिक मामले में स्थापित किया था।

उस मामले में, अदालत ने स्पष्ट किया था कि जब तक कंपनी का दिवाला समाधान चल रहा है, तब तक घर खरीदार कंपनी की संपत्ति के खिलाफ उपभोक्ता अदालत के आदेशों को लागू नहीं कर सकते, लेकिन वे प्रमोटरों और निदेशकों के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से कानूनी कार्रवाई जारी रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

2021 की मिसाल के बावजूद, जिला और राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम अक्सर मामलों पर पूर्ण रोक लगा देते थे। *तेजस जे. शाह (2026)* का निर्णय उपभोक्ता आयोगों के लिए एक अनुस्मारक है कि वे केवल इसलिए व्यक्तिगत निदेशकों के खिलाफ मामलों को नहीं रोक सकते क्योंकि कंपनी NCLT में है।


घर खरीदारों के लिए इसके व्यावहारिक मायने क्या हैं?

यदि आपके बिल्डर के खिलाफ NCLT की कार्रवाई चल रही है, तो आपको यह समझना होगा कि यह फैसला आप पर कैसे लागू होता है:

  • कंपनी के खिलाफ मामला रुका रहेगा: आप सीधे कंपनी के बैंक खातों या संपत्तियों से रिफंड या फ्लैटों पर कब्जा हासिल नहीं कर सकते।
  • निदेशकों के खिलाफ मामला चलेगा: उपभोक्ता अदालत उन व्यक्तिगत निदेशकों और प्रमोटरों के खिलाफ सुनवाई जारी रखेगी जिन्हें आपने अपनी शिकायत में पक्षकार बनाया है।
  • व्यक्तिगत संपत्तियों पर कार्रवाई: यदि उपभोक्ता आयोग सेवा में कमी (उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(11)) के लिए फैसला सुनाता है, तो उस आदेश को निदेशकों और प्रमोटरों के व्यक्तिगत बैंक खातों और संपत्तियों से वसूला जा सकता है।

महत्वपूर्ण सीमाएं

हालांकि यह निर्णय एक बड़ा कदम है, लेकिन घर खरीदारों को व्यावहारिक चुनौतियों के बारे में भी वास्तविक दृष्टिकोण रखना चाहिए:

  • स्वचालित रिफंड नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर फैसला नहीं दिया है। इसने केवल सुनवाई जारी रखने का रास्ता साफ किया है। खरीदारों को अभी भी NCDRC के सामने सेवा में कमी साबित करनी होगी।
  • व्यक्तिगत संपत्ति से रिकवरी की चुनौती: निदेशकों की व्यक्तिगत संपत्ति से पैसे वसूलना जटिल हो सकता है। प्रमोटर अक्सर अपनी संपत्ति ट्रस्टों या परिवार के सदस्यों के नाम पर ट्रांसफर कर देते हैं, जिससे कुर्की की प्रक्रिया लंबी हो जाती है।
  • स्पष्ट आरोप आवश्यक: आप किसी निदेशक को केवल पद के आधार पर उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते। आपकी शिकायत में यह साबित होना चाहिए कि वे प्रोजेक्ट के प्रबंधन और निर्णयों में सक्रिय रूप से शामिल थे।

कानूनी अस्वीकरण (Disclaimer)

*यह लेख केवल सामान्य जानकारी और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। दिवालियापन की कार्रवाई, उपभोक्ता संरक्षण नियम, और NCLT की प्रक्रियाएं हर मामले में भिन्न हो सकती हैं। घर खरीदारों को सलाह दी जाती है कि वे IBC या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत आवेदन करने से पहले किसी योग्य कानूनी विशेषज्ञ (अधिवक्ता) से मामले की पुष्टि अवश्य कर लें।*

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ComplaintAdda Editorial Team

सत्यापित लेखक

संस्थापक एवं मुख्य संपादक, ComplaintAdda

सुमित तिवारी बी.टेक (B.Tech) छात्र और तकनीकी प्रेमी हैं, जो उपभोक्ता जागरूकता, साइबर सुरक्षा और सार्वजनिक शिकायत निवारण पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वह नागरिकों को विश्वसनीय जानकारी प्रदान करने के लिए सामग्री अनुसंधान, संपादकीय समीक्षा और स्रोत सत्यापन की देखरेख करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

IBC की धारा 14 के तहत बिल्डर कंपनी के खिलाफ मामला रुक जाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, यदि आपने प्रमोटरों, निदेशकों और जमीन मालिकों को सह-प्रतिवादी बनाया है, तो आप उनके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से मामला जारी रख सकते हैं।
हाँ। यदि उपभोक्ता आयोग आपके पक्ष में निर्णय देता है और रिफंड का आदेश देता है, तो उस आदेश को निदेशकों/प्रमोटरों की व्यक्तिगत संपत्तियों और बैंक खातों से वसूल किया जा सकता है, लेकिन दिवालियापन के दौरान कंपनी की संपत्तियों से नहीं।
हाँ। निदेशकों के खिलाफ उपभोक्ता अदालत में मामला चलाने के साथ-साथ, कॉरपोरेट देनदार की संपत्ति वितरण में अपना दावा सुरक्षित करने के लिए आपको सार्वजनिक नोटिस में निर्दिष्ट समय सीमा के भीतर अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) के पास फॉर्म CA दायर करना चाहिए।
गैर-कॉरपोरेट प्रतिवादी वे व्यक्तिगत प्राकृतिक व्यक्ति होते हैं, जैसे कंपनी के निदेशक, प्रबंध निदेशक, व्यक्तिगत प्रमोटर, या व्यक्तिगत भूमि मालिक जिन्होंने संयुक्त विकास समझौता किया है, न कि कॉरपोरेट बिल्डर संस्था।
नहीं। एक निदेशक या प्रमोटर अपने कार्यकाल के दौरान की गई सेवा में कमी या धोखाधड़ी के कार्यों के लिए उत्तरदायी बना रहता है जब समझौता सक्रिय था या डिफ़ॉल्ट हुआ था। इस्तीफे से पिछला दायित्व समाप्त नहीं होता।
हाँ। यह कानूनी सिद्धांत कि धारा 14 का स्थगन केवल कॉरपोरेट देनदार पर लागू होता है, भारत के सभी न्यायिक और अर्ध-न्यायिक मंचों पर लागू होता है, जिसमें रेरा (RERA) प्राधिकरण और निष्पादन अदालतें शामिल हैं।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। कार्रवाई करने से पहले हमेशा आधिकारिक स्रोत से पुष्टि करें।
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